Sad shayri

मुकद्दर की लिखावट का इक ऐसा भी कायदा हो,
देर से क़िस्मत खुलने वालों का दुगुना फ़ायदा हो।

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मैं एक नासमझ ही सही मगर वो तारा हूँ जो,
तेरी एक ख्वाहिश को पूरा करने के लिए सौ बार टूट जाऊं।

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आखिर क्यों उलझती रहती है मैं लोगो से,
ये जरूरी तो नहीं ये चेहरा सभी को प्यारा लगे।

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वो पहले सा कहीं मुझको कोई मंज़र नहीं लगता,
यहाँ लोगों को देखो अब ख़ुदा का डर नहीं लगता।

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आ भी जाओ मेरी आँखों के रूबरू अब तुम,
कितना अब ख्वावों में तुझे और तलाशा जाए।

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अल्फ़ाज़ चुराने की ज़रूरत ही ना पड़ी कभी मुझे,
तेरे बे-हिसाब ख्यालों ने मुझे बे-तहाशा लफ्ज़ दिए।

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आसान नही होता है आबाद करना घर मोहब्बत का,
ये तो उनका काम हे जो अपनी ज़िदगी बरबाद करते हैं।

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तू घड़ी भर के लिए मेरी नज़रो के सामने तो आजा,
एक मुद्द्त से मैंने खुद को अभी तक आईने में नहीं देखा।

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कितनी जल्दी दूर चले जाते है वो लोग,
जिन्हें हम जिंदगी समझ कर कभी भी खोना नहीं चाहते।

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आज कोई नया जख्म नहीं दिया उसने मुझे,
कोई पता करो वो ठीक तो है ना।

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कहाँ नहीं है तेरी इन यादों के कांटे,
अब कहाँ तक कोई अपना दामन बचा के चले।

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दम तोड़ जाती है हर शिकायत लबों पे आकर,
जब मासूमियत से वो कहती है कि मैंने क्या किया है?

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उसके सिवा किसी और को चाहना मेरे बस में नहीं,
ये दिल उसका है अगर अपना होता तो बात और थी।

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उस दिल की बस्ती में आज अजीब सा सन्नाटा हैं ,
जिस में कभी तेरी हर बात पर महफ़िल सज़ा करती थी।

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तेरा नज़रिया मेरे नज़रिये से कहीं अलग था,
शायद तुझे अपना वक्त गुज़ारना था और मुझे तेरे साथ अपनी जिन्दगी।

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डरता हूँ कहने से की मोहब्बत है तुम से,
कि मेरी जिंदगी बदल देगा तेरा इकरार भी और इनकार भी।

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सलीक़ा हो अगर भीगी हुई आँखों को पढने का,
तो फिर बहते हुए आंसू भी अक्सर बात करते हैं।

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ये भी एक तमाशा है इश्क ओ मोहब्बत में,
दिल किसी का होता है और बस किसी का चलता है।

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मेरा वक़्त बोला मेरी हालत को देख कर,
मैं तो गुजर रहा हूँ तू भी गुजर क्यों नहीं जाता।

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जागना भी कबूल हैं मुझे तेरी यादों में रात भर,
तेरे एहसासों में जो सुकून है वो इन नींद में कहाँ ।

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इतना ही गुरुर है तो मुकाबला इश्क से कर ऐ बेवफा,
हुस्न पर क्या इतराना जो मेहमान है कुछ दिन का।

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कमाल का जिगर रखते है कुछ लोग,
दर्द पढ़ते है और आह तक नहीं करते।

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ना मैं शायर हूँ ना मेरा शायरी से कोई वास्ता,
बस एक शौक सा बन गया है तेरे जलवों को बयान करना

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मुस्कुरा देता हूँ अक्सर देखकर पुराने खत तेरे,
तू झूठ भी कितनी ईमानदारी से लिखती थी।

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एक उमर बीत चली है मेरी यूं तुझे चाहते हुए,
लेकिन तू तो आज भी बेखबर है कल की तरह।

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तेरी गली में आकर के खो गये हैं दोंनो,
मैं दिल को ढ़ूँढ़ती हुँ और ये दिल तुमको ढ़ूँढ़ता है।

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लिखना तो ये था कि खुश हूँ तेरे बगैर भी,
पर कलम से पहले आँसू कागज़ पर गिर गया

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चेहरे अजनबी हो जाये तो कोई बात नही,
रवैये अजनबी हो कर बडी तकलीफ देते हैं।

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ना जाने वक्त खफा है या खुदा नाराज है हमसे,
दम तोड़ देती है हर खुशी मेरे घर तक आते आते।

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पत्थर भी तो अब मुझसे किनारा करने लगे,
कि तुम ना सुधरोगे मेरी ठोकरे खा कर।

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